Wednesday, 24 February 2010

आज के समय में वक्त की बदलती रफ़्तार ने मानव के भीतर छुपे सच कुछ इस तरह से दबा दिया है की इन्सान यह भी नहीं जनता की वह सच में क्या हैसभी तरफ झूठ और धोखा ही फैला है। मेरी यह कविता मानव जीवन के इसी कटु सत्य पर आधारित है


मिट्टी के फूल

आस-पड़ोस के शहरों में,
गाँव के मेलो में,
अक्ल के बाज़ारों में,
बिकते हैं-
'मिट्टी के फूल'।

वस्त्र हो या चहरा,
चढ़ता है एक के ऊपर एक; 
दिल हो या दिमाग,
फायदा ही देखता है इंसान; 

तिनको से नहीं बनते है घोसले
अब चिड़ियों के,
फूलों से नहीं सजते हैं द्वार
अब घरों के,
सभी जगह मिलते हैं फूल
अब मिट्टी के|

 बुझ-बुझ कर जलते हैं  दीप,
अमर-ज्योत की बात कहाँ !
हैवानो के डेरे में
इंसानों की जात कहाँ !
उठते हैं तूफ़ान अंशुमाली की किरणों से,
स्वर्ण किरण से सुसज्जित
खुला गगन कहाँ !

रेत के महलों में रहते हैं हम,
धरती छोड़, आसमान छुते हैं हम|
जल का हाथ   हमने थमा न होता गर,
तो धूल के गुबार में
अमृत ढूंढ नहीं,  पिला रहे होते हम!

ऐसा नहीं यहाँ  कुछ नहीं,
फूल अब भी खिलते हैं,
केवल फूल - पर -
'मिट्टी के फूल' |
 
                      - परिष्कृत जैन



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